ईरान युद्ध पर खाड़ी देशों का दबाव अब अमेरिकी नीति को प्रभावित करता नजर आ रहा है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) समेत कई खाड़ी देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सैन्य अभियान जारी रखने की अपील की है।
इन देशों का मानना है कि एक महीने की बमबारी के बाद भी ईरान पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है और अभी दबाव बनाए रखना जरूरी है।
युद्ध जारी रखने की मांग क्यों
खाड़ी देशों का कहना है कि मौजूदा स्थिति एक “ऐतिहासिक अवसर” है, जिसमें ईरान की सत्ता संरचना को कमजोर किया जा सकता है।
सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और बहरीन के अधिकारियों ने निजी बातचीत में साफ किया है कि वे तब तक ऑपरेशन खत्म नहीं करना चाहते जब तक ईरान के नेतृत्व या व्यवहार में बड़ा बदलाव न दिखे।
अमेरिका की रणनीति पर असर
यह दबाव ऐसे समय में आया है जब ट्रंप प्रशासन युद्ध को लेकर दोहरी रणनीति अपनाए हुए है।
एक ओर अमेरिका कूटनीतिक समाधान की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर समझौता न होने पर सैन्य कार्रवाई बढ़ाने के संकेत भी दे रहा है।
खाड़ी देशों की अलग-अलग राय
हालांकि सभी खाड़ी देश एकमत नहीं हैं।
- सऊदी अरब और यूएई सैन्य दबाव बढ़ाने के पक्ष में हैं
- यूएई सबसे आक्रामक रुख में है और जमीनी कार्रवाई की वकालत कर रहा है
- कुवैत और बहरीन भी इस विकल्प का समर्थन कर रहे हैं
- ओमान और कतर कूटनीतिक समाधान के पक्ष में हैं
होरमुज जलडमरूमध्य और तेल सप्लाई
खाड़ी देशों ने साफ कहा है कि किसी भी समझौते में होरमुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित रखना जरूरी है।
युद्ध से पहले दुनिया के करीब 20% तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होती थी। मौजूदा संघर्ष ने इस मार्ग को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
ईरान पर सख्त शर्तों की मांग
सऊदी अरब का मानना है कि युद्ध खत्म करने से पहले कुछ प्रमुख शर्तें जरूरी हैं:
- ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना
- बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को नष्ट करना
- क्षेत्रीय समूहों को समर्थन बंद करना
- जलडमरूमध्य को भविष्य में बंद न करने की गारंटी
बढ़ता तनाव और वैश्विक असर
28 फरवरी 2026 से शुरू हुआ यह संघर्ष अब पूरे पश्चिम एशिया में फैल चुका है।
इस युद्ध में अब तक 3,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
अमेरिका के सामने चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। एक ओर उन्हें घरेलू समर्थन जुटाना है, वहीं दूसरी ओर खाड़ी देशों की अपेक्षाओं को भी संतुलित करना है।
फिलहाल संकेत यही हैं कि आने वाले दिनों में अमेरिका की रणनीति और सख्त हो सकती है, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका है।












