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​ऐसा भी क्यों होता है?

​अनुज गुप्ता / Delhi Samachar
​आज जब मैं चारों तरफ देखता हूँ, तो एक अजीब सी बेचैनी महसूस होती है। हम सब भाग रहे हैं, पर कहाँ? यह शायद किसी को नहीं पता। हम सब कुछ पा लेना चाहते हैं, पर जो हमारे पास है, उसका आनंद लेना भूल गए हैं। इसी उधेड़बुन में अक्सर मेरे मन में एक टीस उठती है और मैं बार-बार यही सोचना चाहता हूँ कि आखिर— “ऐसा भी क्यों होता है?”
​मेरे युवान भाई-बहन और वो अनकहा दर्द
​मेरे युवान भाई-बहन, आप इस समाज की असली ऊर्जा हैं, इसकी धड़कन हैं। पर आज मैं आपसे वो बात करना चाहता हूँ जो शायद आप खुद से भी नहीं कह पाते। मैं देख रहा हूँ कि आज आप सब कुछ पाकर भी एक अनजानी सी उदासी से घिरे रहते हैं। चेहरे पर मुस्कुराहट तो है, पर भीतर एक गहरा खालीपन है। जिस उम्र में आपके भीतर एक उत्साह की लहर होनी चाहिए थी, उस उम्र में एक अजीब सी खामोशी और अकेलापन घर कर गया है।
​ऐसा क्यों होता है कि आज का युवा हज़ारों लोगों के बीच होकर भी खुद को तन्हा महसूस करता है? विज्ञान व्रत जी की सादगी भरी पंक्तियाँ आपकी इसी स्थिति को कितनी गहराई से बयां करती हैं:

​”शहर की भीड़ में खुद को भी ढूंढना मुश्किल,
न जाने खो गया है कौन, किसके चेहरे में।”

​​आर्टिफिशियल खुशी बनाम असली सुकून
​आज हमने दूसरों की नज़रों में ‘सक्सेसफुल’ दिखने को ही अपनी मंज़िल मान लिया है। मेरे युवान भाई-बहन, इस आर्टिफिशियल खुशी को असली खुशी मत मानिए। बाहर की चकाचौंध से जो पल भर की तसल्ली मिलती है, वो आपके भीतर के उस खालीपन को कभी नहीं भर पाएगी। असली खुशी तो आपके भीतर की उस शांति में है, जो सादगी और अपनों के साथ साझा किए गए पलों से आती है।
​ऐसा क्यों होता है कि जिस जिंदगी को हमें एक उत्सव की तरह जीना था, उसे हम एक ‘सजा’ मानकर काट रहे हैं? हमने अपनी सादगी को गिरवी रख दिया और बदले में वो थकान और चिंता खरीद ली है जो रातों की नींद छीन लेती है।

याद रखिए, यह जीवन बहुत अनमोल है और आनंद से भरा हुआ है। लेकिन वो जो अंदर का सुकून है, वो बहुत बड़ा है; उसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। दुनिया की कोई भी बाहरी चीज़ आपको तब तक खुश नहीं कर सकती, जब तक आप भीतर से शांत नहीं होंगे।
​रिश्तों का खोता हुआ एहसास
​आज रिश्ते ‘जरूरत’ के तराजू पर तौले जा रहे हैं, जहाँ जज्बात कम और हिसाब-किताब ज्यादा है। आज के रिश्तों पर विज्ञान व्रत जी का एक शेर याद आ रहा है, जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ:

​”कभी जो साथ चलते थे, वो अब मिलते नहीं,
न जाने कौन सी दीवार, बीच में आई।”


​ऐसा क्यों होता है कि एक ही घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे के दिल का हाल नहीं जानते? हमारे पास बात करने के लिए दुनिया भर के साधन हैं, पर एक ऐसा सगा शख्स नहीं जिसके सामने हम अपना मास्क उतार सकें और वो बिना कुछ कहे हमें समझ ले।
​निष्कर्ष: जिंदगी का आईना देखिए
​मेरे युवान भाई-बहन, अब ठहरने का वक्त है। यह जिंदगी का आईना देखिए। हमें उस दिखावे के जाल को काटना होगा जिसने हमारे भीतर के मासूम इंसान को कहीं दबा दिया है। हमें वापस उस सुकून की तलाश करनी होगी जो किसी बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि अपनों के साथ चुपचाप बैठने और अपनी अंतरात्मा को सुनने में मिलता है।
​यह जिंदगी जीने के लिए मिली है, इसे सिर्फ काटने की गलती मत कीजिए। अपनी अंतरात्मा को जगाइए। आइए, इस बनावटीपन की बेड़ियों को तोड़ें और फिर से उस इंसान को जिंदा करें जो असल में मुस्कुराना और बेफिक्री से जीना जानता है।
​एक छोटा सा अहसास:
यह शब्द नहीं, बल्कि मेरे दिल की वो तड़प है जो मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ। अगर इन्हें पढ़कर आपके दिल के किसी कोने में थोड़ी भी हलचल हुई है, तो समझिए कि हमारी अंतरात्मा अभी जाग रही है।

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