अनुज गुप्ता / दिल्ली समाचार
भारतीय इतिहास की जब भी गौरवशाली गाथाएँ गाई जाती हैं, स्वाभिमान के शिखर पुरुष महाराणा प्रताप का नाम सबसे ऊँचे स्थान पर आता है। लेकिन महाराणा प्रताप के उस कठिन संघर्ष और मेवाड़ की स्वतंत्रता के युद्ध में एक ऐसा नाम भी स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जिसके बिना वह इतिहास अधूरा रहता—वह नाम है, दानवीर भामाशाह। आज, 29 अप्रैल को उनकी जयंती के अवसर पर उनके त्याग और राष्ट्रभक्ति को याद करना प्रासंगिक है।
वह ऐतिहासिक क्षण, जिसने इतिहास बदल दिया
हल्दीघाटी के भीषण युद्ध के बाद, मेवाड़ गहरे संकट में था। महाराणा प्रताप संसाधनों की भारी कमी के कारण अपने परिवार और सीमित सैनिकों के साथ अरावली के जंगलों में संघर्ष कर रहे थे। सेना बिखर रही थी और धन का अभाव हर कदम पर बाधा बन रहा था। ऐसे कठिन समय में, महाराणा प्रताप के बचपन के मित्र और मेवाड़ के ‘प्रधान’ भामाशाह आगे आए। उन्होंने अपनी जीवन भर की सारी संचित पैतृक संपत्ति बिना किसी संकोच के महाराणा प्रताप के चरणों में समर्पित कर दी।
निस्वार्थ त्याग और राष्ट्र सेवा
भामाशाह का यह दान केवल धन का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि यह एक राष्ट्र के स्वाभिमान को जीवित रखने का संकल्प था। वह राशि इतनी विशाल थी कि उससे 25,000 सैनिकों का खर्च पूरे 12 वर्षों तक उठाया जा सकता था। इसी अभूतपूर्व सहयोग की बदौलत महाराणा प्रताप पुनः अपनी सेना को संगठित कर पाए और मुगलों के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखते हुए मेवाड़ के एक बड़े हिस्से को मुक्त कराया।
भामाशाह का जीवन सिखाता है कि धन का वास्तविक उद्देश्य केवल व्यक्तिगत संचय नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज की सेवा है। आज आवश्यकता है कि भामाशाह की इस गौरवशाली विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान मिले जिसके वे हकदार है












