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चमकती घोषणाएं और सिसकता मध्यमवर्ग: विज्ञापनों की ओट में छिपती कड़वी हकीकत

अनुज गुप्ता / Delhi Samachar
​आज जब मैं अपने चारों ओर देखता हूँ, तो मुझे बड़े-बड़े दावों और नारों का एक ऐसा तिलस्म दिखाई देता है जिसमें एक आम इंसान की आत्मा कहीं खो गई है। हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ नागरिक को सिर्फ एक ‘आंकड़ा’ मान लिया गया है। हमारे कानों में आश्वासनों का इतना शोर उड़ेला जा रहा है कि हमें अपनी ही अंतरात्मा की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही।
​यह भटकाव वाली जिंदगी आखिर हमें कहाँ ले जा रही है?
​अजीब विडंबना है—जब सत्ता के सुख और सफलता के उत्सव की बात आती है, तो सारा लाभ व्यवस्था की झोली में जाता है। लेकिन जैसे ही आर्थिक चुनौतियां खड़ी होती हैं, नैतिकता और बलिदान का सारा बोझ उसी आम आदमी की कमजोर पीठ पर लाद दिया जाता है। ऊँचे-ऊँचे मंचों और सदनों से बड़ी गंभीरता के साथ हमसे ‘देश हित’ की नई परिभाषाएं साझा की जाती हैं। हमें बताया जाता है कि “देश हित में अगले एक साल तक सोना न खरीदें, ईंधन बचाएं, गाड़ियां कम चलाएं और विदेश यात्राओं का विचार त्याग दें।” हर छोटी-बड़ी कटौती को ‘देश हित’ के साथ इस कदर जोड़ दिया जाता है कि एक आम इंसान अपनी वाजिब जरूरतों के लिए आवाज भी उठाए, तो उसे खुद के अपराधी होने का अहसास होने लगे। जैसे देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को सुधारने का सारा जिम्मा केवल उस मध्यमवर्गीय इंसान की छोटी-छोटी खुशियों की बलि देने पर ही टिका हो।

जिनकी रोजी-रोटी ही इस ‘देश हित’ वाली कटौती की भेंट चढ़ जाती है?
​पर क्या कभी उन नीति-निर्माताओं ने उस मध्यमवर्गीय इंसान के मन में उठने वाले सवालों को पढ़ने की कोशिश की है? जब हमसे ‘देश हित’ के नाम पर सोना न खरीदने की अपील की जाती है, तो क्या किसी ने उन लाखों परिवारों के बारे में सोचा जिनका घर ही सोने के काम और व्यापार से चलता है? उन कारीगरों और छोटे दुकानदारों का क्या कुसूर है, जिनकी रोजी-रोटी ही इस ‘देश हित’ वाली कटौती की भेंट चढ़ जाती है? विडंबना देखिए, इस त्याग का बोझ भी उसी आम आदमी पर है जो खुद भी अभाव झेलता है और अपनों का रोजगार छिनता हुआ भी देखता है। क्या यह ‘देश हित’ केवल एक तरफा है, जहाँ मध्यमवर्ग अपनी हर हसरत कुर्बान कर दे, और व्यवस्था अपनी भव्यता में एक प्रतिशत की भी कमी न करे?

चुनाव जीतने की होड़ में करोड़ों-अरबों के ईंधन और धन को धुएँ में उड़ा दिया जाता है
​विडंबना की हद तो देखिए, जिन गंभीर संकटों का हवाला देकर जनता से ‘त्याग’ की अपील की जा रही है, उन्हीं संकटों के बीच चुनाव जीतने की होड़ में करोड़ों-अरबों के ईंधन और धन को धुएँ में उड़ा दिया जाता है। सदन में ‘कठिन समय’ का उपदेश देने वाली बातें, चुनावी जनसभाओं और भव्य जलसों के शोर में अचानक खो जाती हैं। क्या संयम की यह कसौटी केवल उस आम नागरिक के लिए है जिसकी पहुँच सत्ता के गलियारों तक नहीं है?

​ये तमाशा-ए-अहल-ए-करम तो देखो,
कि चिराग भी जल रहे हैं और अंधेरा भी है।
— विज्ञान व्रत


​आज का मध्यमवर्गीय परिवार एक ऐसी चक्की में पिस रहा है जिसका बोझ हर दिन बढ़ता जा रहा है। हम भाग रहे हैं ताकि अपने घर का सम्मान बचा सकें, लेकिन बदले में हमें केवल एक गहरा मानसिक दबाव मिलता है। कभी हमें ‘देश हित’ के नाम पर चुप करा दिया जाता है, तो कभी भव्य भविष्य के विज्ञापन दिखाकर हमें आज की बदहाली को अपनाने पर विवश किया जाता है।
​जो लोग खुद भव्य आयोजनों के नायक बनते हैं और करोड़ों के सरकारी खर्च पर अपनी मुस्कुराहटें सजाते हैं, उन्हें शायद यह अहसास भी नहीं है कि उस पिता के दिल पर क्या गुजरती है, जिसे घर का बजट साधने के लिए अपने बच्चों की छोटी-छोटी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है।

वो जो ख़्वाब थे मेरे ज़हन में, न मैं कह सका न मैं लिख सका,
ज़बाँ मिली तो कटी हुई, कलम मिला तो बिका हुआ।
— विज्ञान व्रत



​यह लेख सिर्फ कागज पर लिखे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि उस बेबसी की अभिव्यक्ति है जिसे हम हर दिन अपनी शालीनता के पीछे छिपा लेते हैं।

हमें आज रुककर सोचना होगा कि आखिर कब तक मध्यमवर्ग की सहनशीलता को उसकी मजबूरी समझा जाता रहेगा? कब तक त्याग की सारी उम्मीदें सिर्फ उसी इंसान से की जाएंगी जिसकी अपनी जिंदगी अनिश्चितताओं के साये में कट रही है?
​जवाबदेही का मार्ग कभी एकतरफा नहीं होता। यदि जनता से ‘देश हित’ के नाम पर त्याग की अपेक्षा है, तो नेतृत्व को भी अपने आचरण से उस मर्यादा का उदाहरण पेश करना होगा। अब दावों का समय खत्म हो चुका है, अब हमें वह वास्तविक सुकून और सम्मान चाहिए जो इस देश के हर नागरिक का बुनियादी हक है।
​इन्हीं जज्बातों के साथ, मैं अपनी बात को इस उम्मीद में विराम दे रहा हूँ कि हम फिर से उस युग की ओर लौट सकें जहाँ इंसान का जीवन, नारों की चमक से अधिक कीमती हो।

​पत्थर के जिगर वालों को भी मोम कर दे,
वो लहजा, वो गुफ़्तगू, वो सादगी चाहिए।

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