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विरासत विवेकानंद की और राजनीति डर की: आखिर हर बार वही कुछ नाम ही क्यों?

अनुज गुप्ता | Delhi Samachar
​भोपाल की धरती से हाल ही में कुछ ऐसे सवाल उठे हैं, जिन्होंने देश की राजनीति और आम नागरिक के सरोकारों को एक नई दिशा दी है। जब बात देश की सरहद, रोटी और अंतरराष्ट्रीय साठ-गांठ की हो, तो उन पर चर्चा करना ज़रूरी हो जाता है। आज हम उन्हीं मुद्दों की पड़ताल करेंगे जो राहुल गांधी ने अपनी स्पीच में उठाए हैं।

सरकार की चुप्पी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है
​देश की सुरक्षा किसी भी नागरिक के लिए सबसे ऊपर होती है। राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख नरवणे जी की किताब का हवाला देते हुए लद्दाख सीमा पर चीन की हरकतों को लेकर जो बातें कहीं, उन्होंने पूरे देश का ध्यान खींचा है। यहाँ एक बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है—अगर हमारी ज़मीन पूरी तरह सुरक्षित है, तो देश की रक्षा करने वाले इतने बड़े पूर्व सेना प्रमुख को अपनी किताब में ये कड़वे सच दर्ज क्यों करने पड़े? आखिर क्या वजह थी, कि सरहद के इस सबसे बड़े सैन्य रक्षक को सुरक्षा से जुड़ी ये गंभीर बातें अपनी यादों में लिखनी पड़ीं? क्या देश की सरहद का सच जानने का अधिकार हम सबको नहीं है? जब देश की कमान संभाल चुका कोई बड़ा फौजी व्यक्तित्व ऐसी बातें लिखता है, तो सरकार की चुप्पी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।

आखिर ये इत्तेफाक कब तक होगा?
​इस बहस का दूसरा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय रसूखदारों के उस ‘सिंडिकेट’ से जुड़ा है, जिसे ‘एप्स्टीन फाइल्स’ के नाम से जाना जा रहा है। राहुल गांधी ने सीधे तौर पर अडानी और अनिल अंबानी का नाम लेते हुए इसे देश के संसाधनों से जोड़ा। यहाँ सवाल नीयत का है। आखिर क्या वजह है कि दुनिया की हर बड़ी अंतरराष्ट्रीय फाइल, हर बड़ी जांच और हर बड़े विवाद में इन्हीं नामों का कनेक्शन बार-बार सामने आता है? एक बार हो गया हम समझ सकते हैं, दो बार हो गया तो भी मान लेते हैं कि शायद इत्तेफाक होगा। लेकिन हर बार ही क्यों? आखिर ये इत्तेफाक कब तक होगा? जब हर रास्ता घूम-फिर कर इन्हीं कुछ चेहरों पर जाकर रुकता है, तो जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है, कि क्या ये वाकई इत्तेफाक है या फिर कोई सोची-समझी साजिश का खेल?
​यही स्थिति इंडो-यूएस ट्रेड डील जैसे बड़े समझौतों की भी है। ये सुनने में तो विकास की सीढ़ी लगते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपे खतरों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। गारमेंट सेक्टर और हमारे किसानों की फसलों की सही कीमत पर जो संकट मंडरा रहा है, वो चिंताजनक है। क्या ‘प्रोग्रेस’ के नाम पर मज़दूर का काम और किसान की मेहनत की सही कीमत छिन जाना सही है? विकास वो होना चाहिए जो मज़दूर के हाथ को काम और किसान को सम्मान दे।

1893 में जब स्वामी विवेकानंद जी…
​जब प्रधानमंत्री जी की तरफ से यह कहा गया कि उन्हें ‘कांग्रेस की महिलाओं’ से सुरक्षा का खतरा है, तो इतिहास का वो गौरवशाली पन्ना याद आता है जिसने भारत को विश्व गुरु बनाया था। 1893 में जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका के शिकागो में ‘विश्व धर्म संसद’ के मंच पर खड़े हुए थे, तो उन्होंने पूरी दुनिया के सामने भारत की रूह को रखा था। उन्होंने जब ‘Sisters and Brothers of America’ कहकर शुरुआत की, तो पूरा विश्व नतमस्तक हो गया था। विवेकानंद जी ने हमें सिखाया था कि भारत वो देश है जो विरोधियों में भी भाई-बहन का सम्मान देखता है। आज जब विपक्ष की महिला सांसदों के सवालों को ‘सुरक्षा का खतरा’ बताया जाता है, तो राहुल गांधी का वह तंज याद आता है कि—यह डर महिलाओं से नहीं, बल्कि उन कड़वे सवालों से है जिनका जवाब सत्ता के पास मौजूद नहीं है।
​ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के नहीं, बल्कि पूरे देश के हैं। हमारा मकसद किसी का पक्ष लेना नहीं, बल्कि उन मुद्दों को सामने रखना है जो सीधे जनता से जुड़े हैं। क्योंकि जब तक चर्चा नहीं होगी, तब तक समाधान की उम्मीद करना बेमानी है।

“लिखा है खून से जो हमने सच का अफसाना,
मिटा सको तो मिटा दो, हम कलम नहीं बदलेंगे।
मंजिल उन्हीं को मिलेगी जो साथ चलते हैं,
हम अपनी राह, अपना ये धरम नहीं बदल

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