अनुज गुप्ता |Delhi Samachar
इंसाफ की उम्मीद में बैठा एक आम आदमी जब सिस्टम के दोहरे चेहरे को देखता है, तो उसकी रूह कांप जाती है। मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने ‘मल्बेरी कवाना’ के जरिए 64 परिवारों के सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश की। लेकिन मुझे क्या पता था कि यमुना अथॉरिटी (Yamuna Authority) के ओएसडी शैलेंद्र प्रताप सिंह(OSD Shalinder Pratap Singh) कानून की धज्जियां उड़ाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
4 फरवरी: 20 जेसीबी और वो ‘अहंकार’ का आधा घंटा
4 फरवरी 2026 की उस शाम को जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है। ओएसडी साहब वहां किसी अधिकारी की तरह नहीं, बल्कि 20 जेसीबी मशीनों का लश्कर लेकर आए थे। जैसे कोई हमलावर किसी सीमा में घुसता है, वैसे ही गेट तोड़कर ये मशीनें अंदर घुसीं। बिना किसी कानूनी नोटिस के, बिना कोई समय दिए, महज 30 मिनट के भीतर मेरे 64 कॉटेज को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया।
बुलडोजर न्याय (Bulldozer Justice) स्वीकार्य नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि “बुलडोजर न्याय (Bulldozer Justice) स्वीकार्य नहीं है” और किसी भी निर्माण को गिराने से पहले उचित नोटिस और सुनवाई अनिवार्य है। लेकिन यहाँ ओएसडी साहब खुद ही जज बन गए और खुद ही तानाशाह। क्या यमुना अथॉरिटी के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश कोई मायने नहीं रखते?
सिस्टम की बेशर्मी: उजाड़ा भी और रजिस्ट्री का पैसा भी लिया!
इस पूरी नृशंस कार्रवाई का सबसे घिनौना पहलू देखिए—जिस निर्माण को 4 फरवरी को ‘अवैध’ बताकर मलबे में मिलाया गया, उसी जमीन की 26 फरवरी को सरकारी दफ्तर में रजिस्ट्री की गई। सरकार ने रजिस्ट्री के नाम पर मुझसे भारी-भरकम टैक्स वसूला।
मेरा व्यवस्था की नैतिकता से यह तीखा सवाल है—अगर मेरा काम अवैध था, तो सरकारी तिजोरी भरने के लिए मेरा पैसा वैध कैसे हो गया? क्या ओएसडी की जेसीबी और रजिस्ट्री विभाग के बीच कोई तालमेल नहीं है? या फिर विभाग के बीच कोई तालमेल नहीं है? या फिर यह एक सोची-समझी साजिश है कि पहले एक निवेशक को बर्बाद करो और फिर उसी से राजस्व भी वसूल लो ?
64 कॉटेज नहीं, 64 परिवारों के आशियाने उजाड़े गए हैं
उन 20 जेसीबी मशीनों ने सिर्फ दीवारें नहीं ढहाईं, बल्कि उन 64 परिवारों के आशियानों और उनके भरोसे को नेस्तनाबूद कर दिया है, जिन्होंने अपनी जिंदगी की जमा-पूंजी इस प्रोजेक्ट में लगाई थी। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो फरियाद लेकर किसके पास जाएं? वहां कानून कहीं नहीं था, वहां सिर्फ एक अधिकारी की निरंकुशता थी।
मैं आज यह सवाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी और देश की न्यायपालिका से पूछना चाहता हूँ—क्या एक अफसर की हनक कानून से बड़ी हो सकती है? 4 फरवरी को मेरा घर उजाड़ा गया और 26 फरवरी को मेरा पैसा लिया गया। यह विरोधाभास साबित करता है कि यमुना अथॉरिटी के भीतर व्यवस्था कितनी लाचार और अफसरशाही कितनी हावी है।
मेरी लड़ाई अब उस मलबे से शुरू हुई है और इंसाफ के मंदिर तक जाएगी। जब तक उन 20 जेसीबी चलाने वालों और उनके आकाओं की जवाबदेही तय नहीं होती, मैं चैन से नहीं बैठूँगा।












