अनुज गुप्ता | दिल्ली समाचार
सुबह आँख खुलते ही आज हम भगवान का नाम नहीं लेते, बल्कि अपने फोन का ‘नोटिफिकेशन’ चेक करते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आप फोन चला रहे हैं, या फोन आपको चला रहा है?
आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सरहदों की जंग से बड़ी एक जंग हमारे दिमाग के अंदर चल रही है। हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ हमारी पसंद, हमारी नफरत और यहाँ तक कि हमारे आँसू भी ‘एल्गोरिदम’ तय कर रहे हैं।
साथ होकर भी मीलों की दूरी: दिखावे का संसार
हकीकत यह है कि आज जब चार दोस्त एक मेज पर मिलते हैं, तो वे वहां शारीरिक रूप से मौजूद होकर भी मानसिक रूप से कहीं और होते हैं। बैठक में तो हम सब साथ होते हैं, पर हमारा सारा ध्यान ‘सोशल मीडिया’ की बनावटी दुनिया में भटक रहा होता है। हम साथ बैठकर दिल से बातचीत नहीं करते, बल्कि एक-दूसरे के साथ फोटो खींचकर दुनिया को यह दिखाने में व्यस्त रहते हैं कि हम कितने खुश हैं। वसीम बरेलवी साहब का एक शेर इस वर्तमान स्थिति को बखूबी बयां करता है
”अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आएं कैसे।”
हम अपनों के पास बैठकर भी आज अपनों को ही ढूंढ रहे हैं। हम स्क्रीन पर दूसरों की ‘सजाई हुई’ ज़िंदगी देखकर अपनी ‘असली’ ज़िंदगी को कमतर आंकने लगे हैं।
बुद्धिमत्ता का पतन: जब सोचना बंद कर दे इंसान
खतरा इस बात से नहीं है कि तकनीक बहुत समझदार हो गई है, बल्कि खतरा इस बात से है कि इंसान ने खुद अपनी ‘सोचने की शक्ति’ छोड़ दी है। आज हम अपनी याददाश्त के लिए ‘क्लाउड’ पर, अपनी दिशा के लिए ‘मैप्स’ पर और यहाँ तक कि छोटे-छोटे फैसलों के लिए भी मशीनों पर निर्भर हो चुके हैं। जब इंसान अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना बंद कर देता है, तो वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं, बल्कि सिर्फ एक ‘रिमोट कंट्रोल’ से चलने वाली इकाई बन जाता है। सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा तकनीक नहीं, बल्कि इंसान की वह सुस्ती है जो उसे मशीनों का गुलाम बना रही है।
प्राइवेसी का भ्रम: आप बिक रहे हैं और आपको पता भी नहीं
हम कहते हैं कि इंटरनेट ‘फ्री’ है। लेकिन सच यह है कि अगर आप किसी चीज़ के लिए पैसे नहीं दे रहे, तो आप ग्राहक नहीं बल्कि ‘प्रोडक्ट’ (उत्पाद) हैं। आपकी निजी बातें, आपकी पसंद, यहाँ तक कि आपके घर की चारदीवारी में की गई चर्चा भी डेटा बनकर बाज़ार में नीलाम हो रही है। न्यूज़ चैनल सरहदों की जासूसी की बात करते हैं, लेकिन आपके हाथ में मौजूद यह छोटा सा यंत्र आपकी प्राइवेसी तक की जासूसी कर रहा है।
रिश्तों की मौत: स्क्रीन के पीछे छुपा अकेलापन
हमने मीलों दूर बैठे अजनबियों से तो ‘कनेक्शन’ जोड़ लिए, लेकिन दीवार के उस पार रहने वाले पड़ोसी से हमारा ‘संपर्क’ टूट गया। हम ‘स्टेटस’ तो अपडेट कर रहे हैं, पर अपनों का ‘हाल’ भूल चुके हैं। आज का इंसान सबसे ज्यादा ‘कनेक्टेड’ है, और विडंबना देखिए कि इतिहास में सबसे ज्यादा ‘अकेला’ भी आज का ही इंसान है।
तकनीक को अपना साधन बनाइये, अपनी पहचान मत बनाइये। फोन को उतना ही इस्तेमाल कीजिये जितना ज़रूरत हो, वरना एक दिन यह आपकी पूरी शख्सियत निगल जाएगा। इंटरनेट एक समंदर है, इसमें गोता लगाइये, लेकिन डूबिए मत। याद रखिये, दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक आपका अपना ‘दिमाग’ और आपका ‘विवेक’ है। उसे ज़िंदा रखिये।












