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​ज़मीन का ज़हर और आसमान की नुमाइश

Delhi Samachar / अनुज गुप्ता : ​मानवता आज खत्म होती जा रही है। आज मानव को मानव बनाने की सबसे बड़ी जंग जो है, उसकी तरफ तो कोई ध्यान ही नहीं दे रहा है। तकनीक और इस डिजिटल युग में लोग इस कदर अंधे होते जा रहे हैं कि मानव, मानव को भूलता जा रहा है; उसकी संवेदनाएं खत्म होती जा रही हैं, उसका अस्तित्व खोखला होता जा रहा है।

हम तरक्की के तमाशे देख रहे हैं

आज की दुनिया उस राहगीर की तरह है जिसके एक हाथ में तकनीक का चमकता सूरज है और दूसरे हाथ में अपनी ही बर्बादी का सामान। हम उस दौर के गवाह हैं जहाँ इंसान ने समंदर की गहराइयां नाप लीं और आसमान का सीना चीर दिया, पर बगल में बैठे पड़ोसी के दिल का रास्ता भूल गया। दूर कहीं ईरान और इज़राइल के आसमान में जब मिसाइलें रोशनी करती हैं, तो हमें लगता है कि हम तरक्की के तमाशे देख रहे हैं, जबकि असल में वह मानवता की शाम का मंज़र है।
​इस दौर की बेबसी पर विज्ञान व्रत जी का एक शेर मुझे याद आता है:

​”किसी को क्या खबर अपनी गली में क्या हुआ होगा,
कि सब अपनी छतों से दूसरी बस्ती का जलना देखते हैं।”


​तबाही का जश्न और खोखली जीत
​दुनिया आज एक ऐसे पागलपन की गिरफ्त में है जहाँ ‘जीत’ का मतलब सिर्फ दूसरे की लाशों की गिनती रह गया है। हकीकत यह है कि पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक सैन्य खर्च 2.4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुँच गया है। विडंबना देखिए कि दुनिया के पास एक-दूसरे को मिटाने के लिए अरबों डॉलर हैं, पर भूख और प्यास से तड़पते बच्चों के लिए हम ‘फंड’ की कमी का रोना रोते हैं। चाहे वह इज़राइल की ज़िद हो या ईरान का पलटवार, इस शतरंज के खेल में मोहरे हमेशा आम इंसान ही बनते हैं।
​भारत के भीतर की खामोश जंग
​अगर हम अपने देश की बात करें, तो यहाँ की तस्वीर भी कुछ कम पेचीदा नहीं है। हम बाहर की जंगों पर बहस तो खूब करते हैं, लेकिन हमारे भीतर जो ‘विचारों का युद्ध’ छिड़ा है, उस पर चुप्पी साध लेते हैं। आज का दौर वह है जहाँ लोग एक-दजहाँ लोग एक-दूसरे की विचारधारा से इस कदर नफरत करने लगे हैं कि हम एक ही छत के नीचे रहकर भी अजनबी हो गए हैं। हमारी सबसे बड़ी ताकत ‘एकता’ थी, पर आज हम डिजिटल दीवारों के पीछे खड़े हैं जहाँ से हमें सिर्फ अपनी ही आवाज़ सही लगती है।

​”वो अपने ही घरों में इस तरह महफूज़ बैठे हैं,
कि जैसे शहर की हर आग उनके घर से बाहर है।”

एक मार्मिक किस्सा: ज़मीर की आवाज़
​जंग और नफरत के बीच एक छोटा सा किस्सा याद आता है जो दिल पर गहरी चोट करता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब एक शहर मलबे में तब्दील हो रहा था, एक सैनिक ने दूसरे ‘दुश्मन’ सैनिक पर बंदूक तानी। अचानक उस दुश्मन की जेब से उसके छोटे बच्चे की तस्वीर नीचे गिरी। उस एक पल के लिए बारूद की गंध गायब हो गई और दोनों की आँखों में सिर्फ एक पिता का साझा दर्द बचा था। उन्होंने बंदूकें नीचे कर लीं। वह पल ‘चेतना’ का पल था। आज हमें उसी संजीदगी की ज़रूरत है, जो हमें याद दिला सके कि सरहद के उस पार वाला भी किसी का बेटा, किसी का बाप और किसी का सपना है।
​समाधान: संवाद ही आखिरी रास्ता है
​इतिहास गवाह है कि कोई भी मिसाइल आज तक शांति नहीं ला सकी है। दुनिया को बारूद से बचाने का इकलौता रास्ता ‘हथियारों की होड़’ नहीं, बल्कि ‘संवाद की मेज’ है। हमें अपनी तकनीक का इस्तेमाल नफरत फैलाने के बजाय पुल बनाने के लिए करना होगा। जब तक हम ‘मैं और तुम’ से ऊपर उठकर ‘हम’ नहीं सोचेंगे, तब तक ये आग ठंडी नहीं होगी।
​निष्कर्ष
​अगर हम अब भी नहीं संभले, तो इतिहास हमें एक ऐसे दौर के रूप में याद रखेगा जिसने चांद पर तो कदम रखे, पर ज़मीन पर इंसानियत के निशान खो दिए। जंग चाहे सरहद पर हो या हमारे घर के भीतर, हार हमेशा मोहब्बत की ही होती है। दुनिया को बदलने के लिए हथियारों की नहीं, एक-दूसरे के आंसू समझने वाली आँखों की ज़रूरत है।

​”हवा के रुख़ को क्या दोष दें हम अपनी बर्बादी का,
चिरागों को बुझाने की ज़िद तो अपनों की ज्यादा थी “

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