अनुज गुप्ता / दिल्ली समाचार
जब हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) की बात करते हैं, तो वह हमें केवल ‘बोलने की आज़ादी’ नहीं देता, बल्कि वह हमें यह साहस देता है कि हम अपनी तकलीफों, अपनी मेहनत की कमाई और अपने भविष्य पर सवाल उठा सकें। संविधान हमें यह अधिकार देता है कि हम पूछें कि आखिर जिस देश की बुनियाद ‘हम भारत के लोग’ हैं, वहां उस ‘आम आदमी’ की अपनी हैसियत क्या रह गई है?
आज एक आम आदमी के जीवन को देखिये। वह सुबह अपनी दहलीज पार करता है तो उसके माथे पर एक ही चिंता होती है—कि आज की दिन-रात की मेहनत से क्या वह अपने परिवार की ज़रूरतें पूरी कर पाएगा? वह सारा दिन खटता है और महीने के आखिर में जब उसके हाथ में उसकी गाढ़ी कमाई आती है, तो उसे अहसास होता है कि उसकी इस कमाई पर उसका अकेले का हक नहीं है; सरकार ने पहले ही उसमें अपना हिस्सा (टैक्स) तय कर रखा है।
जीएसटी की पेचीदगियों और टैक्स की अंतहीन फाइलों से लड़ने में बिता देता है
यही पीड़ा उस संघर्षशील उद्यमी की भी है, जो अपना छोटा सा कारखाना या लघु उद्योग (MSME) चलाता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) हमें अपना काम करने की आज़ादी तो देता है, पर आज का छोटा उद्यमी इस आज़ादी के असली मायने तलाश रहा है। वह उत्पादन करने से ज्यादा समय सरकारी कागजों की उलझनों, जीएसटी की पेचीदगियों और टैक्स की अंतहीन फाइलों से लड़ने में बिता देता है। एक तरफ कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और दूसरी तरफ व्यवस्था की पाबंदियां—आज का छोटा व्यापारी तरक्की का सपना क्या देखेगा, वह तो बस अपनी साख और अपनी इकाई को डूबने से बचाने की जद्दोजहद कर रहा है। जब बड़े घरानों को राहतें मिलती हैं, तब इस छोटे उद्यमी के हिस्से में केवल नए नियमों का बोझ और अनदेखा शोषण आता है।
हमरे टैक्स के पैसे हमरे बच्चे के एजुकेशन , अस्पताल मे लगते है ?
सच तो यह है कि वह आम आदमी या छोटा व्यापारी जब अपनी बीमार मां के लिए दवा खरीदता है या बच्चे के लिए दूध का पैकेट उठाता है, तो वह अपनी हर छोटी खरीद पर छिपे हुए टैक्स भर खरीद पर छिपे हुए टैक्स भर रहा होता है। यह हमारा वह पैसा है जिसे संविधान के अनुच्छेद 266 के तहत सरकारी खजाने की ‘अमानत’ कहा जाता है। हमें बताया गया था कि यह पैसा हमारे बच्चों के लिए स्कूल और बीमारों के लिए अस्पताल बनकर आएगा।
लेकिन जब वही इंसान शाम को घर लौटकर टीवी चलाता है, तो उसका कलेजा मुँह को आता है। वह देखता है कि जिस देश में आज भी इलाज के अभाव में लोग दम तोड़ देते हैं और छोटे उद्योग फंड की कमी से दम तोड़ रहे हैं, वहां ₹20,000 करोड़ की लागत से एक आलीशान, चमकती हुई नई संसद खड़ी कर दी गई। क्या ईंट-पत्थरों की यह भव्यता उस व्यापारी की मशीनें दोबारा शुरू कर पाएगी जो कर्ज और टैक्स के बोझ तले थम गई हैं?
विपक्ष चिल्लाता है, सरकार जवाबों से बचती है
इतना ही नहीं, उस संसद को चलाने का खर्च जानते हैं कितना है? लगभग ₹2.5 लाख प्रति मिनट! यानी जब तक आप इस लेख की चंद पंक्तियाँ पढ़ेंगे, देश के लाखों रुपये स्वाहा हो चुके होंगे। और नतीजा क्या निकलता है? हर सत्र भारी हंगामे के बीच खत्म हो जाता है। विपक्ष चिल्लाता है, सरकार जवाबों से बचती है और अंत में शोर-शराबे के बीच सदन स्थगित हो जाता है। वह पैसा, जो हमारी अपनी कमाई का एक-एक रुपया था, वह उस आलीशान इमारत के भीतर बिना किसी ठोस काम के बर्बाद हो जाता है। क्या महंगी कुर्सियों से लोकतंत्र मजबूत होता है, या जनता के उन सवालों से जो हंगामे में दबा दिए जाते हैं?
और सबसे ज्यादा टीस तब उठती है, जब चुनाव की आहट होती है। मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की फौज सरकारी विमानों और ईंधन का इस्तेमाल अपनी पार्टियों के प्रचार के लिए करने लगती है। CAG की सरकारी रिपोर्ट्स बार-बार फिजूलखर्ची पर सवाल उठाती हैं, पर ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता।
SPG का बजट ₹289 करोड़ से ₹600 करोड़ को पार
ज़रा सुरक्षा के खर्च पर गौर कीजिये। साल 2014-15 में सरकारी आंकड़ों के अनुसार SPG का बजट ₹289 करोड़ था। आज 2026 में यह बढ़कर ₹600 करोड़ को पार कर गया है। यानी रोज़ का ₹1.62 करोड़ से ज्यादा का खर्च! हम पूछते हैं कि क्या नयानी रोज़ का ₹1.62 करोड़ से ज्यादा का खर्च! हम पूछते हैं कि क्या नेताओं का प्रोटोकॉल और उनका रुतबा हमारी बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य की ज़रूरतों से बड़ा हो गया है?
महंगाई का वह पहाड़ आम आदमी पर टूटेगा
आज मार्च 2026 है। दुनिया में जंग के हालात हैं और तेल महंगा है, लेकिन हमारे यहाँ कीमतें थमी हुई हैं। यह कोई मेहरबानी नहीं, यह सिर्फ एक चुनावी मुखौटा है। जैसे ही आखिरी वोट पड़ जाएगा, यह मुखौटा उतरेगा और महंगाई का वह पहाड़ आम आदमी पर टूटेगा कि घर चलाना और छोटा व्यापार बचाना मुश्किल हो जाएगा।
इन हालातों को देखकर दिल बस यही कहता है जो दुष्यंत कुमार जी ने सालों पहले कहा था:
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
यह पैसा किसी पार्टी की जागीर नहीं, यह हमारा है। यह संविधान हमें चुप रहने के लिए नहीं, बल्कि अपनी अमानत का हिसाब माँगने का अधिकार देता है। अगर आज हम नहीं बोले, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब हमारा घर और हमारा हक रैलियों के धुएं में उड़ाया जा रहा था, तब हम खामोश क्यों थे?
जय हिंद! जय संविधान!












