Click to listen highlighted text!

लोकतंत्र की अदालत में एक आम आदमी का बयान हुजूर क्या मैं सिर्फ एक वोट हूं !

अनुज गुप्ता / Delhi Samachar

आज मैं लोकतंत्र की उस ऊंची अदालत में खड़ा हूं जहां फैसले तो जनता के नाम पर लिए जाते हैं । लेकिन खुशियां सिर्फ उन चंद लोगों के घरों में आती हैं जो सत्ता के करीब है । हुजूर मेरा कसूर सिर्फ इतना है कि मैं एक आम आदमी हूं जो सुबह उठकर अपनी मेहनत से इस देश का चक्का घुमाता है। लेकिन रात को लौटते वक्त उसकी अपनी जिंदगी का चक्का किस्तों और चिताओं के बीच फंसा होता है ।

डिग्री की बाजार में कीमत एक रद्दी के कागज से भी कम है

हुजूर सबसे पहले उसे नौजवान की गवाही सुनिए जिसे इस व्यवस्था ने भविष्य का लालच देकर सालों तक यूनिवर्सिटीज के कमरों में कैद रखा बाप ने अपनी उम्र भर की जमा पूंजी जिस डिग्री की फीस में झोंक दी आज उस डिग्री की बाजार में कीमत एक रद्दी के कागज से भी कम है । नौजवान बेरोजगार नहीं है उसे तो सिस्टम ने बेबस बना दिया है वह अपनी काबिलियत का सबूत लेकर दर-दर भटकता है पर लोकतंत्र के इस बाजार में हुनर नहीं सिफारिश और सौदा चलता है । क्या यह शिक्षा का अपमान नहीं है ? या फिर यह बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज महज डिग्रियां बेचने की दुकानें बन चुकी है !

लोकतंत्र ने हमें अधिकार दिए पर महंगाई ने हमसे सुकून छीन लिया

हुजूर दूसरा बयान उसे मध्यम वर्गीय पिता का है जो अपनी पूरी जिंदगी दिखावे और दबाव की सूली पर चढ़ा चुका है । लोकतंत्र ने हमें अधिकार दिए पर महंगाई ने हमसे सुकून छीन लिया । हमारी जिंदगी अब महज आंकड़ों का खेल है। दूध का बिल, स्कूल की फीस , अस्पताल का खर्चा और अंतहीन किश्तें । हम जिंदा तो हैं पर क्या हम आजाद हैं ? या हम उन बड़ी कंपनियों और बैंकों के आधुनिक गुलाम बन चुके हैं । जिनके लिए हम दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह खट रहे हैं ।

थक गया है हर शख्स दूसरों को खुश करते-करते अपनी ही जिंदगी अब उधर सी लगने लगी है

कहां गया था कि लोकतंत्र में अंतिम व्यक्ति की आवाज सुनी जाएगी । पर आज की हकीकत यह है कि जिसकी जेब भारी है लोकतंत्र उसी की भाषा बोलता है । नीतियां हमारे लिए नहीं बल्कि उन धन कुबेरों के मुनाफे के लिए बनाई जाती हैं जो सत्ता की कुर्सियों को सहारा देते हैं । आम आदमी के पास सिर्फ एक अधिकार बचा है और वह अधिकार यह है चुपचाप रहना । चुपचाप सहना जब हम सवाल पूछते हैं तो हमें धर्म जाति और नारे की बातें बता दी जाती हैं ताकि हम अपनी खाली थाली की की तरफ न देख सके।

हाथों की लकीरों से अब पसीना नहीं सूखता मुकद्दर भी अब अमीरों की चौखट पर सजदा करता है

हुजूर मेरा सवाल सीधा है क्या इस लोकतंत्र में मेरी मेहनत की कोई कीमत है ? या मैं सिर्फ एक वोट हूं जिसे 5 साल में एक बार इस्तेमाल करके कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाता है । अगर शिक्षा हमें रोजगार नहीं दे सकती अगर कानून हमें सुरक्षा नहीं दे सकता और अगर यह व्यवस्था हमें सम्मान नहीं दे सकती तो फिर इस लोकतंत्र का जश्न किसके लिए है । याद रहे जिस दिन आम आदमी की सहनशक्ति जवाब दे देगी उस दिन कागज की यह दीवारें और झूठे वादे ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे। “लगी है आग तो आएंगे कई घर जद में यहां पर सिर्फ हमारा ही मकान थोड़ी है ।”

Related Articles

Follow Us

1,005FansLike
785FollowersFollow
22,900SubscribersSubscribe

Latest Articles

Click to listen highlighted text!