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वो ‘अटल स्वाभिमान’, जिसने वाशिंगटन की पाबंदियों से ज्यादा भारत के ‘नैतिक साहस’ को चुना!

​अनुज गुप्ता | Delhi Samachar
​मई 1998 की वो तपती दोपहर आज भी इतिहास के सीने पर दर्ज है। जब पोखरण की रेतीली जमीन से भारत ने परमाणु परीक्षण किया, तो पूरी दुनिया दंग रह गई। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने सीधे तौर पर आर्थिक पाबंदियों की धमकी दी और भारत को अपनी शर्तों पर झुकने के लिए हर संभव दबाव बनाया। वाशिंगटन का इरादा साफ था—भारत को परमाणु क्लब से बाहर रखना और उसे तकनीकी व आर्थिक रूप से लाचार कर देना। लेकिन उस समय भारत की सत्ता पर वो नेतृत्व बैठा था जिसकी जड़ें इस देश के स्वाभिमान में बहुत गहरी थीं। प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी का वह फैसला किसी व्यक्ति की जिद नहीं, बल्कि एक उभरते भारत का आत्मविश्वास था।


​अटल जी ने अमेरिका को जो जवाब दिया, वो कूटनीति के इतिहास का एक कड़वा सच है
​”मिस्टर प्रेसिडेंट, आप जिस भारत को पाबंदियों की धमकी दे रहे हैं, वो अपनी सुरक्षा से समझौता करना नहीं जानता। हम अभावों में रहना चुन सकते हैं, लेकिन अपने आत्म-सम्मान का सौदा करना हमारी फितरत नहीं। अगर देश की सुरक्षा की खातिर हमें मुश्किल वक्त भी देखना पड़े, तो हम उसे स्वीकार करेंगे। लेकिन याद रखिएगा—भारत माँ का मस्तक आपकी किसी शर्त या धमकी के आगे नहीं झुकेगा। हम अपनी सुरक्षा के लिए किसी की दया के मोहताज नहीं हैं।”


​देश के नाम संदेश: संघर्ष की तैयारी
​परीक्षण के बाद अटल जी ने देश को संबोधित करते हुए किसी बड़ी जीत का दावा करने के बजाय आने वाली चुनौतियों के बारे में ईमानदारी से बात की थी। उन्होंने देशवासियों को संघर्ष के लिए तैयार करते हुए कहा था:
​”मेरे प्यारे देशवासियों, परीक्षण सफल रहा है, लेकिन अब असली परीक्षा की घड़ी शुरू होती है। दुनिया हमें दबाने की कोशिश करेगी और हमें अकेला छोड़ने की साजिश रची जाएगी। पर सवाल यह है कि क्या हम अपनी आज़ादी, राष्ट्र के गौरव और अपने इस ‘अटल संकल्प’ की रक्षा के लिए अभावों में जीने को तैयार हैं? याद रखिएगा, एक शक्तिशाली भारत ही विश्व में शांति की गारंटी दे सकता है।”
​ रणनीतिक चुप्पी और सरहदों की जमीनी हकीकत
​एक पत्रकार के तौर पर हमें आज की ‘रणनीतिक चुप्पी’ पर भी सवाल उठाने होंगे। पूर्व थल सेना प्रमुख के संस्मरणों के जरिए जो बातें सामने आई हैं, वे देश की सुरक्षा नीति पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उस दौर में भारत ने दुनिया को यह दिखाया था कि हम अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। आज जब हम सीमाओं पर एक तरह की ‘हिचक’ और संशय का माहौल देखते हैं, तो वो समय याद आता है जब 2001 में संसद पर हमले के बाद अटल जी खुद जवानों के बीच सरहद पर जा खड़े हुए थे। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया था कि राजनीतिक नेतृत्व सेना के फैसलों के साथ चट्टान की तरह खड़ा है।


​सैन्य गौरव और भविष्य का सवाल
​आज का नौजवान उस ‘विज़न’ की कमी इसलिए महसूस करता है क्योंकि कारगिल के बाद उसी दौर में शहीद के सम्मान की नई परिभाषा लिखी गई थी। वह ऐतिहासिक फैसला, जिसने शहीद का पार्थिव शरीर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उसके गांव की मिट्टी तक पहुँचाने की परंपरा शुरू की, उसने सेना के प्रति आम आदमी के जुड़ाव को कई गुना बढ़ा दिया था। सैनिक को पता था कि अगर उसे कुछ हुआ, तो पूरा देश उसके परिवार की जिम्मेदारी उठाएगा। आज ‘अग्निपथ’ जैसी योजनाओं और असुरक्षित भविष्य के बीच जब नौजवान खुद को खड़ा पाता है, तो वह उस ‘सुरक्षा और सम्मान’ की तुलना करता है जो कभी भारतीय सेना की पहचान हुआ करती थी। राजनाथ सिंह जी, जो उसी राजनीतिक स्कूल के सिपाही रहे हैं जहाँ ‘राष्ट्र प्रथम’ का पाठ पढ़ाया गया, आज इन गूँजते सवालों के बीच शांत क्यों हैं?


​ कूटनीतिक जीत बनाम घरेलू दबाव
​अटल जी के समय में भारत ने केवल परमाणु विस्फोट ही नहीं किया था, बल्कि उसके बाद लगी पाबंदियों को अपनी कूटनीति से बेअसर भी कर दिया था। यह किसी भी आधुनिक राष्ट्र के लिए एक बड़ी सीख है कि नेतृत्व का आत्मबल ही तय करता है कि दुनिया आपको किस नजर से देखेगी। आज के दौर में जब वैश्विक समीकरण बदल रहे हैं, क्या हम उसी ‘अटल इच्छाशक्ति’ के साथ खड़े हैं, या फिर हमारी रणनीतियां केवल छवि सुधारने तक सीमित रह गई हैं?

​अटल जी ने संसद के पटल से सत्ता के मोह से ऊपर उठकर एक महामंत्र दिया था, जो आज के नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी सीख है:
​”सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।”
​आज हमारा सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम उस ‘स्वाभिमान और भरोसे’ को बचा पा रहे हैं जिसे उन्होंने अपने सिद्धांतों से सींचा था? यह मान-सम्मान महज़ एक तोहफा नहीं, बल्कि इस मिट्टी की वो अनमोल धरोहर है जिसे किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देना चाहिए। यही भारत की असली पहचान है और यही इसकी आन-बान और शान है।

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