भारत में ऑस्कर (Oscar) के लिए नामांकित फिल्म ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ (The Voice of Hind Rajab) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। फिल्म के भारतीय वितरक मनोज नंदवाना ने दावा किया है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इस फिल्म को मौखिक रूप से प्रमाणन देने से इनकार कर दिया है, जिससे इसकी सिनेमाघरों में रिलीज़ पर रोक लग गई है।
यह फिल्म गाजा युद्ध (Gaza War) के दौरान वर्ष 2024 में मारी गई एक 5 वर्षीय बच्ची की कहानी पर आधारित है।
CBFC से लिखित जवाब नहीं मिला
वितरक मनोज नंदवाना के अनुसार, उन्हें इस फैसले की पहले से आशंका थी। उनका कहना है कि पिछले एक साल में कई फिल्म महोत्सवों में भी इस फिल्म को स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं दी गई।
उन्होंने बताया कि इस बार उन्हें CBFC की ओर से कोई लिखित अस्वीकृति नहीं मिली है, जबकि इससे पहले उनकी एक अन्य फिल्म को “सामाजिक तनाव” का हवाला देते हुए लिखित रूप में खारिज किया गया था।
फिल्म फेस्टिवल में भी नहीं मिली जगह
फिल्म को भारत के कई प्रमुख फिल्म समारोहों, जैसे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) और बेंगलुरु इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (Bengaluru International Film Festival) में भी प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली।
हालांकि, इसे कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (Kolkata International Film Festival) में प्रदर्शित किया गया, जिसे लेकर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आयोजकों ने केंद्रीय मंजूरी की प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस
इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने फिल्म पर रोक को “निंदनीय” बताया।
उन्होंने कहा कि किसी फिल्म का प्रदर्शन समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) को दर्शाता है और इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जोड़ना एक परिपक्व लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है।
निर्माताओं और वितरक को झटका
बताया जा रहा है कि इस फिल्म के अधिकार लगभग ₹1 करोड़ में खरीदे गए थे। फिल्म पर अचानक लगे इस प्रतिबंध से इसके निर्माताओं और वितरक को बड़ा झटका लगा है।
नंदवाना ने यह भी कहा कि वह इस मामले में कानूनी चुनौती देने की योजना नहीं बना रहे हैं।
सेंसरशिप को लेकर फिर उठे सवाल
पिछले कुछ समय में सेंसरशिप (Censorship) और फिल्मों में राजनीतिक विषयों को लेकर CBFC के फैसलों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
विशेष रूप से, वास्तविक घटनाओं और राजनीतिक संदर्भों को फिल्मों से हटाने या सीमित करने की प्रवृत्ति पर बहस तेज हुई है।
लेखक – DelhiSamachar
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