नई दिल्ली, 16 मार्च। राष्ट्रीय राजधानी में बाल श्रम की वर्तमान स्थिति की समीक्षा, रोकथाम, बचाव और पुनर्वास के लिए बेहतर समन्वय के रास्ते तलाशने के उद्देश्य से “बाल श्रम मुक्त दिल्ली की ओर” विषय पर एक राज्य स्तरीय परामर्श बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में सरकार के प्रतिनिधि, बाल संरक्षण संस्थानों, नागरिक समाज संगठनों तथा नीति विशेषज्ञों ने भाग लिया। बैठक पहल संगठन द्वारा आयोजित की गई। इसमें क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) और फारेस्टर ज्ञान साझेदार के रूप में शामिल रहे। कांस्टीट्यूशन क्लब आफ इंडिया, नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति के जी बालाकृष्णन ने संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करने और बच्चों के अधिकारों व गरिमा की रक्षा के महत्व पर जोर दिया।
चर्चा में सामने आया कि दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024–25 के दौरान 2,588 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया, जिससे दिल्ली देश के उन क्षेत्रों में शामिल हो गई है जहाँ सबसे अधिक कार्रवाई हुई है। बच्चों को अब भी घरेलू काम, ढाबों, निर्माण स्थलों, छोटे विनिर्माण और कढ़ाई-कारीगरी इकाइयों, कचरा छंटाई, रैग-पिकिंग तथा सड़क पर सामान बेचने जैसे कामों में लगे हुए पाया जा रहा है। ऐसे कार्य प्रायः असुरक्षित परिस्थितियों में होते हैं और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समग्र विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
पहल के महासचिव डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह और उत्तर भारत में क्राई की प्रोग्राम हेड जया सिंह ने बाल श्रम जैसी समस्या का स्थायी समाधान में समुदायों की सक्रिय भागीदारी और जमीनी स्तर पर सामुदायिक जुड़ाव को मजबूत पर जोर दिया। जितेन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि वर्तमान स्थिति की सामूहिक समीक्षा कर सहयोगात्मक समाधान विकसित किए जा सकें और बाल श्रम मुक्त समाज की दिशा में आगे बढ़ा जा सके, जो विकसित भारत 2047 की परिकल्पना को भी मजबूत करता है। जबकि जया सिंह ने कहा,“दिल्ली जैसे शहरी क्षेत्रों में बाल श्रम को एकल समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता; यह कई परस्पर जुड़े सामाजिक और आर्थिक कारकों से जुड़ा मुद्दा है, जो प्रवास, गरीबी, स्कूल से बाहर होना और कमजोर सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों से गहराई से प्रभावित होता है। दिल्ली में बचाव अभियान तो हुए हैं, लेकिन अब ज़रूरत इस बात की है कि रोकथाम और दीर्घकालिक पुनर्वास पर अधिक ध्यान दिया जाए, ताकि बच्चे दोबारा श्रम में न लौटें।












